ऐतिहासिक धरोहर मुगलकालीन स्वर्ण मुद्राएं

Monday, October 7, 2013

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अंकिता मिश्रा, भोपाल।

वन और खनिज संपदा से परिपूर्ण प्रदेश  को देशभर में जैव विविधता के लिए भी जाना जाता है। इतना ही नहीं ऐतिहासिक धरोहरों और संस्कृतियों के लिए भी यह पहचाना जाता है। पिछले साल प्रदेश  के बुरहानपुर जिले से प्राप्त हुईं 482 स्वर्ण मुद्राएं इसका ताजा उदाहरण हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों ने अपने परीक्षणों और विश्लेषण  के आधार पर इन मुद्राओं को मुगलकालीन सल्तनत का बताया है। इन स्वर्ण मुद्राओं पर शासक का नाम और वर्ष बाकायदे सुनहरे अक्षरों में उकेरे गए हैं। प्रदेश की खनिज संपदा और धरोहर से लोगों को परिचित कराने के लिए प्रदेश सरकार ने भोपाल स्थित राज्य संग्रहालय में मुद्राओं की प्रदर्शनी भी लगवाई। इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और उन्होंने मुगलकालीन मुद्राओं को बारीकी से देखा और मुद्रा के इतिहास से जुड़े पहलुओं को भी जाना।


सबसे अधिक मद्राएं औरंगजेब की-
इन मुद्राओं की सबसे खास बात यह है कि इन्हें देखने पर समयकालीन परंपरा और कला के दर्शन होते हैं। प्रदर्शित में जितनी भी स्वर्ण मुद्राएं प्रस्तुत की गईं वे जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब के काल की हैं। प्राप्त 482 मुद्राओं में 430 सिक्के सिर्फ औरंगजेब के शासनकाल के हैं। औरंगजेंब के शासनकाल की 430 मुद्राओं में अहमदनगर की 3, अकबराबाद की 3, औरंगाबाद की 115, बुरहानपुर की 39, इलाहाबाद की 9, जाफराबाद की 6, गोलकुंडा की 9, खम्बात की 31, काबुल की 2, मुलतान की 9, पटना की 2, सोलापुर की 35 और सूरत से जारी 216 टकसालें शामिल हैं।
सबसे कम संख्या जहांगीर के काल के सिक्कों की हैं। इनकी संख्या मात्र 4 हैं,  वहीं शाहजहां के समय के समय के सिक्के 33 हैं। इसमें से 3 मुद्राएं अहमदाबाद की, इलाहाबाद की 9, बुरहानुपर की 4 मुद्राएं, दौलताबाद की और मुलतान से जारी की गई 4 टकसालें शामिल हैं। जहांगीर का शासनकाल 1605-1627 ई. तक रहा। शाहजहां ने 1628 से 1658 तक शासन किया, वहीं औरंगजेब ने 1658 से 1707 तक सल्तनत संभाली।
इससे पहले भी इस तरह की स्वर्ण मुद्राएं खुदाई में मिली चुकी हैं। 1953 के सबसे बड़ा दफीना बयाना, राजस्थान से गुप्तकालीन स्वर्ण मदुाएं मिली। इसके बाद सबसे बड़ा दफीना मप्र के जिले बुरहानपुर में मिला, जो अपने आप में एक बड़ा उदाहरण है। 467 मुगलकालीन स्वर्ण मुद्राओं का इतना बड़ा संग्रह अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।


खुदाई में मिला खजाना-
बुरहानपुर शहर के सिकारपुरा  क्षेत्र की निवासी सविता रानी और उनके पति मुकेश  को घर में खुदाई के दौरान 2003 में ये स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुईं। जब उनको कलश  में भरी हुईं ये मद्राएं मिली तो सब भूले गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि प्राप्त सिक्कों का क्या करें। कुछ दिनों तक उन्होंने इस बात की किसी को काई खबर नहीं दी, लेकिन गुजरात के जूनागढ़ निवासी अपनी पुत्री-दामाद को इसके बारे में बताया। उन्होंने सिक्कों को अपने बेटी-दामाद के पास भेज दिया। दामाद ने अपने मित्र को यह बात बताई। स्वर्ण मुद्राओं को कैसे और किस रूप में अपने पास संरक्षित किया जा सकता है। इस समय इसकी बाजार में कीमत क्या है। इन सभी पहलुओं पर विचार विमर्श  के बाद यह तय हुआ कि सिक्कों को गलाकर रॉड  तैयार की जाए। कुछ सिक्कों को उन्होंने गलाया भी। इसी बीच दोनों दोस्तों में मतभेद हो गया। दूसरे मित्र ने कहा कि आधा हिस्सा इसमें से दो, वराना पुलिस को बता देंगे। दोस्त की यह बात सुनकर सविता के दामाद ने स्वयं पुलिस को खजाने के बारे में बताया। पुलिस ने मुद्राएं अपने कब्जे में कर लीं और सरकार ने जांच पड़ताल के बाद तय कि इसे शासकीय खजाने में डाल दिया जाए। गुजरात सरकार के हाथों में प्रदेश से प्राप्त हुई ऐतिहासिक धरोहर चली गई। यह बात सुनकर सविता रानी ने तय किया कि मुद्राएं प्रदेश  में प्राप्त हुईं हैं, इसलिए ये प्रदेश की ही धरोहर हैं। यह बात मप्र शासन को भी पता चली। सिक्कों की खोजबीन की गई। आखिरकार 6 अगस्त 2007 को मध्य प्रदेश की निधि होने का आदेश एम.ए.जी./सी 3940/2006 आदेश पारित किया। इसके बाद पुरातत्व आयुक्त ने एक टीम गठित करके गुजरात राज्य से सिक्कों को प्रदेश में लाने की तैयारी शुरू की। इसके बाद 23 फरवरी 2010 को स्वर्ण मुद्राएं प्रदेश शासन को मिली, जिन्हें प्रदेश के राज्य संग्रहालय में 24 फरवरी 2010 को सौंपा गया।

गो फॉर स्लिम

Friday, August 9, 2013

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यदि आप मोटापे की ओर बढ़ रहे हैं और पतले होने की कोई युक्ति नहीं सूझ रही है, तो नए साल के आगमन पर आप ये पंद्रह सकल्प ले सकते हैं कि फूड मीनू में ये फूड शामिल करेंगे और अपना रुटीन हेल्थ चैकअप भी स्वयं करेंगे।

अंडा-
फुल प्रोटीन से परिपूर्ण अंडा को यदि आप अपने फूड मीनू में शामिल करेंगे तो निश्चित ही अपनी सेहत को अच्छा रख सकेंगे, लेकिन इतना याद रखें कि हाई कैलोरी ब्रेड के साथ इसका सेवन न करें। नाश्ते में दो ब्रेड के साथ आमलेट लें।
बीन-
प्रोटीन और कोलियोस्टोनिन से पूरिपूर्ण बीन आपके स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर रहेगी। इसमें पाया जाने वाला कोलियोस्टोनिन तत्व आपको स्लिम और ट्रिम बनाए रखेगा। इसके सेवन से डायजेस्टिव हार्मोन सक्रिय रहता है जो आपके मोटापे को कंट्रोल करता है। रिसर्च के जरिए यह सिद्ध हो चुका है कि यदि आप दिन में दो बार बीन का सेवन करते हैं तो आप स्लिम और ट्रिम रह सकते हैं। यह आपके पेट को भी बाहर निकलने से रोकता है। इतना ही नहीं यह आपके कोलेस्ट्रॉल को भी कन्ट्रोल करती है।
सलाद-
सलाद तो मोटापे को कम करने की सबसे कारगर युक्ति है। सलाद को खाने से एक तो आप हाई कैलोरी के इनटेक से बचते हैं और आपकी भूख भी शांत हो जाती है। रिसर्च के जरिए पता चला है कि जो लोग विटामिन सी, ई, फोलिक एसिड और कैरोटिनॉइड्स से परिपूर्ण सलाद का सेवन करते हैं, उन्हें मोटापे की समस्या नहीं होती है। अपने डेली मीनू में सभी तरह के सलाद को प्रायिकता के साथ शामिल करें।
ग्रीन टी-
वाकई आप मोटापे से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो आप टी के बजाय ग्रीन टी का सेवन करें। दिन में दो बार यदि ग्रीन टी लेते हैं, तो सच मानिए आपका मोटापा तो छूमंतर हो जाएगा। मोटापे के साथ-साथ यह बेकार कोलेस्टॉल को भी कम करता है।
पियर्स-
पियर्स यानि नाशपाती तो सभी खाते हैं, लेकिन इसके फायदे से कम ही वाकिफ हैं। यदि आप नाशपाती का सेवन करते हैं, तो मोटापे को बाय कह सकते हैं। एक मीडियम साइज की नाशपाती आपको पतला बना सकती है। आपने शायद यह सोचा भी नहीं होगा। प्रोटीन फाइबर से परिपूर्ण नाशपाती ब्लड में शुगर लेवल भी कम करती है, लेकिन इतना ध्यान रखें कि कुछ खाने के बाद और भोजन करने के बाद इसको न खाएं। ब्राजील में हुई रिसर्च में यह सामने आया है कि 12 सप्ताह तक लगातार इसका सेवन करने से महिलाओं के वजन में कमी आई है।
सूप-
यदि आप नॉन वेज लेते हैं, तो इसकी बजाय इसके बने सूप का इस्तेमाल करें। आप सीधे चिकन न खाकर इसका सूप पिएं। पाडर््ू यूनिवर्सिटी में हुए अध्ययन में यह सामने आया है कि जिन्होंने भूख को मिटाने के लिए सीधे नॉनवेज न लेकर उससे बने सूप का इस्तेमाल किया तो उनके वजन में गिरावट आई।
नो चर्बी-
यदि आप मांस खाने के आदी हैं, तो चर्बी वाला मांस न लें। चर्बी वाले हिस्से को पहले ही निकाल दें। ऐसा करके आप न सिर्फ अपना मोटापा कंट्रोल कर सकेंगे बल्कि अन्य बीमारियों से भी छुटकारा पा सकेंगे।
आलिव आयल-
सर्दी में कारगर दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला आलिव आयल आपको पतला बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आस्ट्रेलियन स्टडी के जरिए यह पता चला कि जिन महिलाओं को महावारी आना बंद हो चुकी थी, जब उन्हें आलिव आयल से तैयार ब्रेकफास्ट और स्किम मिल्क दिया गया तो उनकी मेटापे में गिरावट आई, लेकिन आलिव आयल को ओटमील के साथ कभी नहीं लेना चाहिए।
ग्रेप फूड-
रिसर्च के जरिए यह पता चला है कि दिन में तीन बार जूस लेने और खाना खाने के पहले एक बार ग्रेप फूड का इस्तेमाल करने वाले लोगों में मोटापे की समस्या कम देखी गई। इसमें पाए जाने वाले पॉलिकेमिकल्स इंसूलिन लेवल को कम करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि आपकी बॉडी में मौजूद कैलोरी तेजी से ऊर्जा में बदलती है।
दालचीनी-
दालचीनी भी मोटापे को कंट्रोल करती है। खाने से पहले लगने वाली तेज भूख को भी नियंत्रित करती है। ऐसा होने से आप अधिक खाने से बच जाते हैं। यदि आप दिन में आधा चम्मच दालचीनी पावडर का इस्तेमाल करते हैं, तो ब्लड शुगर, कॉलेस्ट्रॉल और ट्राईग्लिसराइड के स्तर को कंट्रोल कर सकते हैं।

बेटियों से हरा हुआ गांव

Thursday, July 25, 2013

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गोहद से लौटकर अंकिता मिश्रा।

देश में जहां बेटियों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में स्वर तेज हो रहे हैं। वहीं भिंड जिला के ब्लाॅक गोहद के सेंघवारी गांव के लोगों ने बेटियों के हक में अपने हाथ पहले ही उठा लिए थे। बेटी के पैदा होते ही, उसके नाम के पांच पेड़ गांव में लगाए जाते हैं। ऐसा करके लोग बेटी को बचाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। प्रदेश में चल रही ‘बेटी बचाओ योजना’  तो एक साल पहले ही शुरू की गई है, लेकिन बेटियों के हित में गांव के लोग बहुत पहले ही चेत गए थे। लोगों को लड़कियों के जनम और उनके संरक्षण के प्रति प्रेरित किया यहां के नाट्य समूह ‘‘बांधो मुट्ठी बहना‘‘ ने।


इस जिले में मध्य प्रदेश के अन्य जिलों के मुकाबले लिंगानुपात बेहद कम है। वर्ष 2011 की जनगणना में जारी किए आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो स्पष्ट  नजर आता है कि वर्ष 1991 से लेकर 2011 के बीच शिशु लिंगानुपात में मप्र में भारी गिरावट आई है। 1991 में प्रति हजार लड़कों पर जहां 941 लड़कियां थी, अब उनकी संख्याग महज 912 बची है। भिंड जिले में शिशु लिंगानुपात सबसे कम और चौंकाने वाला है। प्रति हजार लड़कों पर सिर्फ 835 ही लड़कियां हैं। 2001 में यह आंकड़ा 832 था जिसमें कि मामूली बढ़ोत्तजरी हुई है। यह हर्ष की बात है। इसके पीछे सामाजिक चेतना और सरकारी सख्तीं क यह हमारे लिए चिन्ता  का विषय है। शिशु लिंगानुपात के मामले में मप्र के भिण्डब जिले के ब्लॉीक गोहद के सेंघवारी गांव में लड़कियों की संख्या एक समय में लड़के मुकाबले बेहद कम हो गई थी। यहां पर शिशु लिंगानुपात 800 से भी नीचे पहुंच गया था। इसकी मुख्य वजह बेटियों को पैदा होने से पहले या पैदा होने के बाद मार देना ही था। इसके पीछे की मुख्य लोग बेटियों की शादी में लगने वाला भारी-भरकम दहेज मानते हैं। यही कारण है कि घर में बेटी के जनम को लोग नासूर की तरह समझते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। बेटियों को लोग घर की हरियाली और खुशी मानने लगे हैं और  गांव में बेटी के नाम पर पांच पेड़ लगाने की परंपरा चल पड़ी है।
गांव के लोगों की इस अभिनवव पहल को ध्यान में रखते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग, ग्वालियर एवं चंबल संभाग भी जाग गया है। यही कारण है कि विभाग ने भिंड, मुरैना जिले में ऐसे 25 से अधिक गांवों की सूची तैयार की है, जहां बेटी के नाम पर पेड़ लगाए जाएंगे। जिले में ऐसे ही गांवों को आगे किया जाएगा जहां पर बेटियों की संख्या कम है और जहां रूढि़वादी परंपराओं के चलते परिवार में उचित सम्मान नहीं मिलता है।

बनाई नुक्कड नाटक मंडली-
गांव की बोली-भाषा में तैयार किए गए नुक्कड़ नाटक का असर लोगों पर अन्य संचार माध्यामों के मुकाबले अधिक होता है। यही वजह है कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने इस मुहिम को गति देने के लिए चार नुक्कड़ नाटक मंडली भी तैयार की हैं जो गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटक के माध्यम से बेटी बचाओ का संदेश देगी। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से कन्या भू्रण हत्या, जन्म के समय मार देना, लड़के-लड़की में भेद-भाव, बालिका शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े विषय भी शामिल होंगे।

नहीं मरेंगी बेटियां-
भिंड जिले में पिछले दो सालों से सक्रिय नुक्कड़ नाटक मंडली बांधो मुट्ठी बहना ने इस बात का प्रण किया है कि अब यहां बेटियां नहीं मारी जाएंगी। उन्हें भी जीने का हक मिलेगा। इसके बारे में नाटक मंडली की प्रमुख गीता सिसोदिया बताती हैं कि अपने आस-पास के माहौल में उन्होंने लड़कियों की दुर्दशा को देखा है। पहली बात तो उन्हें जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है, यदि जन्म ले भी लेती हैं तो फिर लोग उन्हें मार देते हैं। यदि किसी तरह जीवन के आगे के सफर को तय करती हैं, तो उन्हें घर में प्यार और सम्मान नहीं मिलता। पति और परिवार के तमाम विरोध करने के बावजूद उन्होंने किसी की नहीं सुनी। समाज में बेटियों को बराबर का हक मिले, उन्हें कोई मारे नहीं। इसको लेकर उन्होंने दस महिला सदस्यों की नुक्कड़ नाटक मंडली बनाई और गांव-गांव जाकर बेटी बचाओ की मुहिम को आगे बढ़ाने में लग गईं। गीता का कहना है कि लाख रूकावटंे आने के बावजूद भी वह अपनी मुहिम को विराम तब तक नहीं देंगी, जब तक कि जिले के हर गांव में बच्चियों को बराबर हक और सम्मान नहीं मिल जाता है।

नातिन के नाम पर लगाए पेड़-

सेंघवारी गांव के सरपंच पूरन सिंह बताते हैं कि पहले इस गांव में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम थी। लोग भी लड़की पैदा होने पर मां को ही बुरा-भला कहते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। गांव के कुछ लोग जागरूक हुए और उन्होंने बेटी के नाम पर पेड़ लगाने की परंपरा शुरू की है। इसका नतीजा यह हुआ है कि गांव तो हरा-भरा दिखता ही है, साथ ही बेटियों की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है। गांव के बुजुर्ग शिवसिंह ने गांव में पेड़ लगाने की परंपरा शुरू की थी। उन्होंने अपनी बेटी प्रीति के नाम पर 15 साल पहले पांच पेड़ लगाए थे जो आज बड़े होकर गांवभर के लोगों को हवा और छाया दे रहे हैं। पेड़ लगाने की परंपरा को कायम रखते हुए उन्होंने अपनी नातिन रोशनी के नाम पर भी पांच पेड़ लगाए हैं। उनके इस काम को देखते हुए गांव के अन्य लोग भी इस पहल को आगे बढ़ा रहे हैं।

जारी रहेगी मुहिम- 
शुरू हुई ये मुहिम बंद नहीं होगी, बल्कि अनवरत जारी रहेगी। बिटिया के संरक्षण के लिए महिला एवं बाल विकास पूरी सक्रियता के साथ पहल को आगे बढ़ा रहा है। विभाग के ग्वालियर एवं चंबल संभाग के संयुक्त संचालक सुरेश तोमर बताते हैं कि ऐसे गांवों को सूचीबद्ध किया जा रहा है, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम है। इतना ही नहीं लड़कियों को मारने के लिए तरह के कृत्य भी लोगों द्वारा किए जा रहे हैं। जन जागृति के लिए ऐसे गांवों में नुक्कड़ नाटक किए जाएंगे। लोगों को जागरूक किया जाएगा। उनकी सहमति हर एक लड़की के नाम से पेड़ भी लगाया जाएगा। बेटी के नाम पर जो लोग पेड़ लगाएंगे उनका भावात्मक लगाव भी बढ़ेगा, जिससे पेड़ की देख-रेख ठीक ढंग से होगी, साथ ही बच्ची की परवरिश और पढ़ाई-लिखाई पर भी विशेष ध्यान देने के लिए उन्हें प्रेरणा मिलेगी। इतना ही नहीं संबंधित जिले के जनप्रतिनिधि स्वयं अपने क्षेत्र में जाकर लोगों को बिटिया बचाओ अभियान से जोड़ेंगे।

पर्दे पर छाया मध्य प्रदेश

Sunday, July 21, 2013

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छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे पर बालीवुड में मध्य प्रदेश वासियों ने अपनी अलग छाप छोड़ी है। फिल्म इंडस्ट्री में जया बच्चन, रजा मुराद, जीनत अमान से लेकर शरद सक्सेना ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपने सषक्त अभिनय और अथक मेहनत से नाम के साथ-साथ सिनेमा में गहरी पैठ बनायी है। सभी का प्रदेश से गहरा रिश्ता  रहा है। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, बल्कि अनवरत जारी है। मुंबई पहुंचने वाले कलाकारों, अभिनेताओं की सूची दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रदेष से बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली कलाकार निकलकर मुंबई नगरी में उपस्थिति दर्ज करा रहे है। कोई पर्दे के सामने रहकर अपने अभिनय और अपने कार्यों से प्रदेशवासियों को गौरवांन्वित करा रहा है, तो कोई पर्दे के पीछे पसीना बहाकर दिनरात एक करके बुलंदियों पर पहुंचने के लड़ रहा है। 


मेहनत तो कलाकार ही करता है, लेकिन नाम तो प्रदेश और शहर का ही होता है। मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा, और शाहवर अली ऐसे नाम हैं, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी मेहनत और लगन से प्रदेश  को नई पहचान दी है। नब्बे के दशक के बाद से मुंबई और सिनेमा की ओर रुख करने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। सत्तर और अस्सी के दशक में मुंबईया सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी जया बच्चन हो या फिर रजा मुराद सभी ने अपने अभिनय से लोगों के दिल को जीता और प्रदेशवासियों को विश्वास दिलाया कि उनके अन्दर भी दम है और कुछ कर दिखाने का जज्बा कायम है। अच्छी फिल्म पटकथाओं के लिए जानी वाली सलीम और जावेद की जोड़ी को बनाने वाला भी मध्य प्रदेश  ही है। इंदौर की धरा में पले-बढ़े सलीम और भोपाल की आवो-हवा में घुले मिले जावेद अख्तर की कलम की ही सशक्त कलम का ताकत सुपरहिट शोले फिल्म है, जिसने उस समय हैट्रिक देकर अमिताभ और धर्मेन्द्र की जोड़ी को नई पहचान दी थी। आज के समय की बात करें तो आज भी मध्य प्रदेश  हिन्दी सिनेमा में राज कर रहा है।  सलमान खान की फिल्म ‘‘एक था टाइगर‘‘ ने सभी रिकार्ड को तोड़ते हुए सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म का रिकार्ड अपने नाम किया है। सलमान भी इंदौर की धरा पर जन्में हैं। उनके दोनों भाई अरबाज और सोहेल खान भी यही पैदा हुई हैं। फलती-फूलती जमीं ने कलाकारों को तो बुलंदी पर पहुंचाया ही है, साथ ही हम प्रदेशवासियों  का सिर भी गर्व से ऊंचा किया है।
अभिनय के क्षेत्र में ही नहीं संगीत और गायन के क्षेत्र में प्रदेश के कलाकारों ने कीर्तिमान रचे हैं। स्वर कोकिला लता मंगेश्कर व आशा  भोसले भी इंदौर में जन्मी हैं। वहीं सदाबहार गीतों और अभिनय के लिए जाने वाले अशोक  व किशोर दा भी खंडवा की जमीं पर पैदा हुए। इतना ही नहीं सागर के रहने वाले विट्ठल भाई पटेल ने फिल्म ‘‘बाॅबी‘‘ में बेहतरीन गीत लिखकर ऋषि कपूर और नीतू सिंह की जोड़ी को उस समय युवाओं की सबसे पसंदीदा जोडि़यों में से एक बना दिया था। नबाव पटौदी का लिंक भोपाल शहर से होने के कारण शहर खेल के साथ-साथ सिनेमा के क्षेत्र में भी बुलंदियों पर छाया रहा। शर्मिला टैगोर, सोहा अली खान और सैफ अली खान आज भी शहर में आते हैं और शहरवासियों को इस बात का अहसास कराते हैं कि भोपाल हमेशा की तरह फिल्मी दुनिया में अपनी गरिमामय उपस्थिति बनाए रखेगा। नई प्रतिभाएं पैदा करने में भी शहर महत्वपूर्ण रोल अदा कर रहा है।

पर्दे के पीछे-
पर्दे के पीछे भी प्रदेश व शहर  का बड़ा जनसमूह काम कर रहा है, जिसमें निर्देशक, एडीटर, संगीतकार, गीतकार और तकनीकि विशेषज्ञ शामिल हैं। भोपाल में लंबे समय तक रहे फिल्म निर्देशक रोमी जाफरी का भी शहर से लगाव अभी कम नहीं हुआ है। यही वजह है कि उन्होंने पिछले साल यहां पर फिल्म ‘‘गली-गली में चोर है‘‘ की शूटिंग की, हालांकि फिल्म को बाॅक्स आॅफिस पर सफलता नहीं मिली, लेकिन फिल्मकार द्वारा अपने शहर को ध्यान में रखते हुए फिल्म निर्माण करना कोई छोटी बात नहीं है। मुंबई की चमक-दमक को छोड़ निर्देशक  और प्रोड्यूसर थ्री टायर सिटी की ओर रुख कर रहे हैं। यह हमारे लिए हर्ष की बात है। शहर से निकले कलाकारों और निर्देशकों की पहल पर बड़े कलाकार और निर्देशकों ने भी यहां आकर फिल्म निर्माण किया है। इसमें मेगा बजट की फिल्में जैसे-राजनीति, आरक्षण और चक्रव्यूह शामिल हैं। इसके अलावा छोटे औसत बजट की फिल्म पीपली लाइव की शूटिंग भी भोपाल के पास के गांव में ही की गई। राख और बटर फ्लाई जैसी छोटी फिल्में भी हैं, जिनकी शूटिंग भोपाल शहर व आस-पास के क्षेत्रों में हुई हैं। फिल्मकार इतनी बड़ी संख्या में फिल्म बनाने के लिए अग्रसर हो रहे हैं। इसका कारण यहां मिलने वाली सुविधाएं और प्रतिभाशाली कलाकार हैं। ऐसा होने से स्थानीय कलाकारों को मंच तो मिला ही है; साथ ही उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में भी सुधार आया है।

बनाई जगह-
प्रदेश के कलाकारों ने बॉलीवुड  में अपनी खास पहचान बनाई है। चाहे निर्देशक  हो या फिर कलाकार, सभी में अद्वितीय प्रतिभा है। जाने-माने निर्देशक  सुधीर मिश्रा प्रदेश के सागर जिले से हैं, जिन्होंने धारावी, खोया-खोया चांद जैसी  मशहूर फिल्में बनाई। सिनेमा की गहराई को समझने वाले सुधीर की पहचान एक मझे हुए फिल्म निर्देशक  रूप में इंडस्ट्री में होती है। सागर यूनीवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सुधीर ने फिल्म इंडस्ट्री की ओर रुख 60 के दशक में किया, तब उन्हें शायद इस बात का भान भी नहीं था कि आगे चलकर वे इतने अच्छे निर्देशक  बनेंगे। फिल्म से जुड़ी किसी भी प्रकार की पढ़ाई उन्होंने नहीं की, लेकिन फिल्म संस्थान में पढ़ने वालों से लगातार कुछ न कुछ सीखते रहे। उनकी सीखने की आदत का ही नतीजा है कि आज वे जहां हैं, वहां पहुंचना हर किसी के बस का काम नहीं हैं। यह बात उन्होंने स्वयं एक इंटरव्यू के दौरान कही। गंभीर निर्देशकों में गिने जाने वाले सुधीर की पसंदीदा अभिनेत्रियों की बात करें तो चित्रांगदा ही उनकी फेवरेट अभिनेत्री हैं, जो गुण उन्हें उनके अंदर नजर आते हैं, वैसे किसी में नहीं दिखते। वैसे चित्रांगदा ने भी फिल्म ‘‘देसी ब्याॅज‘‘ से अपनी धमाकेदार वापिसी करके अपने प्रशंसकों को खुश कर दिया है। फिल्म ‘‘जोकर‘‘ में उन्होंने आयटम सांग किया है। जब मध्य प्रदेश की बात निर्देशक के योगदान के संदर्भ में की जा रही है तो प्रदेश  के प्रमुख शहर ग्वालियर को छोड़ा नहीं जा सकता है। गीतकार जावेद अख्तर ने अपना बचपन इसी शहर में गुजारा है। भोपाल से उन्होंने अपनी स्नातक तक की पढ़ाई पूरी की। इसके अलावा प्रदेष से कई प्रतिभाएं निकली हैं जिन्होंने बॉलीवुड  में अपना योगदान देकर सिर्फ प्रदेश का मान ही नहीं बढ़ाया है, बल्कि देश  का भी सिर ऊंचा किया है। इसमें कवि प्रदीप, सदानन्द किरकिरे और राहत इंदौरी व निदा फाजली जैसे नाम शामिल हैं।